Monday, April 5, 2021

जाने के बाद

 


सब कुछ वैसा ही रहा,

धरती, आकाश, जंगल

और वो खुद भी!

शांत, स्थिर और सुंदर!


टूटा कुछ मेरे अंदर 

पर

किसी ने आवाज़ नहीं सुनी!

कुछ बिखरा अचानक,

पर किसी ने नहीं देखा!

कुछ खो गया,

किसी ने ध्यान नहीं दिया!

उसने भी नहीं;

चले जाने के बाद।



~मनुज मेहता



कहां हो?

 कहां हो?

आपके दिल में

अच्छा! कब से?

जन्म जन्मांतर से!


ऐसी कितनी ही बातों के समंदर

ले के चलते हैं लम्हे!

और यादों की उफनती लहरें

टकराती हैं ज़हन के साहिल पर।


मैं 

उस दिल में बसे रहने के लिए

किसी कड़वी याद को बुझा देता हूं

शाम के साए में 

एक उम्मीद जला देता हूं!



~मनुज मेहता

Saturday, October 24, 2020

कितनी परतें

कितनी परतें चढ़ा दी है परतों पर

पहुंचूं तुम तक तो भला कैसे

कोई सिरा हाथ नहीं आता।


वक्त को मैंने तो थाम के रखा है

तुम्हारे हाथो से फिसल रहा है

लम्हा लम्हा, कतरा कतरा।


गुज़रे वक्त को रोज़ संवारता हूं

छांटता हूं पीले लम्हों को

मुरझा रहे हैं, 

हर पल गुजरते वक्त के साथ।

रोज़ कोशिश करता हूं, संभालूं।

शायद तुम्हारे हाथों से जी जाएं।


अपनी सांस की हवा दे दो

अपनी उंगलियों की छुअन

अधूरे लम्हे, नए की आस में

शायद फिर हरे हो जाएं।


~मनुज मेहता

Tuesday, April 28, 2020

मुई रात

कुछ तो अटका है
हलक में शायद,
जाम है धड़कन भी
भारी सीना है
मद्धम है सांस भी शायद।

लब सूखे हैं आंखे नाशाद हैं
नींद भी कमबख्त कबसे नाराज़ है
चैन भी है बेचैन आजकल
बहुत कुछ है अजीब आजकल।

कुछ तो तरकीब हो कोई
कुछ तो तरीका हो,
कि इस मुई रात को भी
नींद आए
और इस सुबह का भी सवेरा हो।

- मनुज मेहता

Tuesday, March 3, 2020

सिर्फ़ तुम

मैंने जब तुम्हारे बालों को छुआ
तुम मुड़ी, थोड़ा हंसी, मैं भी हँसा
फिर हमारे साथ
झील, वादी, पहाड़, बादल
फूल, कोंपल, शहर, जंगल
सब के सब हंसने लगे
हमारी हंसी ने भर दिया इक रंग
रेत को कर दिया सुनहरा
चाँद को और रौशन।

फिर तुमने छुआ
सिर्फ मेरे होंठों या
हाथों-भर को नहीं
तुमने छुआ
मेरे अंतर्मन को
जन्म जन्मांतरों को
सुख और दुःख को।
खुशी और वेदना को।
तुमने
सिर्फ तुमने
तुम्हीं ने।

हम दोनों का होना ज़रूरी है
हम दोनों के लिए।

-मनुज मेहता

जन्मों की डोर

कई जन्मों की डोर हैं हम
मैं और तुम
जन्मों साथ चले हैं
सदियों के फ़ासले तय किये है हमने

एक जन्म
जब गीज़ा की मीनार तले
रेत पर खड़ी थी तुम
मैं खानाबदोश चला आया था ऊँठ लिए।
काले लिबास में ढंकी
तुम्हारी आँखों का प्यार वही था
जब
घूंघट के छोर से देखा था तुमने
सफेद कुर्ते और धोती में
मुझे अगले जन्म में।

इस जन्म
रेत पे जहां
तुमने पैरों से निशान बनाये
उन्ही पर रख के पैर
थामा है तुमको।

इस डोर को
थामे रखो।
जन्मों के धागों से बंधे रिश्ते
यूँ नही टूटा करते।

-मनुज मेहता

Friday, January 10, 2020

पहाड़ी शहर

कुछ देर के लिए ही आये थे
वक्त था हमारे पास और तुम्हे देखना था वो
पहाड़ी शहर

झील के पास भुट्टे अभी भुन ही रहे थे
कि बरसात की बूंदों ने भिगो दिया था हमको।

तुम अटक के रह गयी थी बाजार के उस तरफ
बिना छतरी।

मैं इंतेज़ार में खड़ा रहा बड़ी देर उस गुम्बद तले जहां सारा शहर ही चला आया था।
जब बरसात न थमी न ही हल्की हुई, तुम्हे ढूंढते हुए जा पहुंचा था तुम्हारे पास।
तुम दूर से मुस्कुरा दीं थी।

तुम्हे बरसात पसंद आ रही थी उस रोज़।

और उस एक छतरी और बहते हुए पानी में भीगते हुए वापिस आ गए थे गुम्बद तले।

तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा
तैरता है आंखों में।

Friday, December 20, 2019

रेत का शहर


उस कोने के कमरे में जाने से
अब जी घबराता है।
तुमसे पड़ी चादरों पे सिलवटें
साफ नज़र आती हैं अब भी।

वो दरवाज़ा जो चीख़ के बंद होता था
तुम्हे सुनने के लिए चुपचाप खड़ा है।

वो मुंढेर पर पड़े मटके
अब भी वहीं है तुम्हारे हाथों
के निशान लिए।

वो बॉनफायर की जगह
वो लिहाफ, वो सीढियां
देखती हैं एक टक मुझे

वो बच्चे जो कभी लिपटते थे तुमसे
पूछते हैं तुमको हर बार
मैं टॉफियों से बहला देता हूँ उनको।

हो सके तो चलो इक बार फिर
जो रात छोड़ आये थे रेत पर
उसको सुबह दे दें।

अकेले
उस रेत के शहर जाने से अब जी घबराता है।








Saturday, May 31, 2014

पुरानी किताब

आओ वो पुरानी किताब ढूंढें,
जिसके सफों में बरसों पहले,
एक गुलाब रखा था हमने, 
आओ! उसे पानी दे दें 
मुरझा गया है शायद.

सर्दी की वो सर्द सुबहें भी,
कितनी गर्म थीं उस शॉल के अंदर
जिसे हम अक्सर ओढ़ लिया करते थे 
आओ! वो शॉल ढूंढें.

कॉफी होम के वो दिन, याद हैं ना,
कितने आसान से थे,
तुम्हारा आना, मेरा मिलना
और शाम का हंसते हुए चुपचाप ढल जाना
आओ! उन हंसती शामों की सुबह ढूंढें.

आओ! वो पुरानी किताब ढूंढें!

~मनुज मेहता

Friday, June 5, 2009

ज़िन्दगी

मैं खींच लूँगा आकाश से नीली चादर
और सफ़ेद बादलों से नरम तकिया,

घास से मांग लूँगा हरा कालीन
और पेड़ से छप्पर,

तुम्हारे लिए सब कुछ वैसा ही रखूँगा,

शरद के आकाश में आधा चाँद,
झींगुरों का संगीत
और जुगनुओं की टिमटिमाती रौशनी.

रात को लगने वाली प्यास के लिए पास की नदी
और तुम्हे रिझाने के लिए कुछ नक्षत्र और आकाशगंगा.

हवा भी मंद मंद तुम्हारे बालों को सहलाती चलेगी.

जहाँ जहाँ तुम्हारा तपता स्पर्श होगा वही फूटेगी ईब
तुम्हारी आधी मुंदी आँखों में मेरे जगे स्वप्न तैर जायेंगे
और एक नयी कविता लिखेंगे

और तुम्हारी रौशनी में
मेरे कुछ अँधेरे शब्द पा जायेंगे ज़िन्दगी.

Saturday, February 21, 2009

दरवाज़ा

जब तुम खोलोगी दरवाज़ा,
तो तुम्हारे पीछे का वो आला
अपनी कितोबों की आभा
उड़ेल देगा तुम पर,

खिड़की की धूप
रौशन कर देगी तुमको
और हवा
न जाने तुम्हारी कितनी ही खुशबूएं ले आएँगी मुझ तक

चिड़ियों की न जाने कितनी ही आवाजें
तुम्हारे साथ मुझे अंगीकार करने को आतुर होंगी,

और पलाश की अन्तिम किरण
हमारे ही कमरे में बुझेगी.

तुम्हारी हँसी जैसे दिन के हर यौवन को
अपनी अंजलि से उछाल देगी मेरी तरफ़.

और जब तुम्हारे होठों की परछाइयां झुकेंगी मेरे होठों पर
सांझ का रंग डूब जाएगा.

तब आनंत में एक खिड़की खुलेगी
और हमारी देह को दीप्त करती हुई
अन्तरिक्ष में प्रेम की जगह बनाएगी.

अनंत तारों एक बिछौना होगा
और हमारी देह
एक ज्वलंत पुष्प!

Sunday, January 18, 2009

हारे हुए शब्दों का मोल

सुनो, तुम मेरे शब्दों का मोल क्या दोगे?
कहाँ हैं तुम्हारी जेब में आकाश गंगा और हजारों सितारे?

बिस्तर की कितनी ही सिलवटों में
धरती,आकाश
और अन्जले चिरागों को समेटा है मैंने.

तुम्हारे अस्वीकार के बाद
उन हारे हुए शब्दों का क्या मोल?

डूबते हुए अंधेरे के अदृश्य कम्पन में
चाँद मेरी आंखों में कई बार डूबा है,

तुम्हारे बदलते रंगों से ,
तुम्हारी त्वचा के उजास से
अंधेरे और उजाले के बीच की खामोशी से.
अपने अंगों से,
अपनी देह से,
अपने मन से,
अपने ही भार से,
और तुम्हारे मर्दन से,
डर लगता है

तुम्हारा चुप रहकर मेरे निराश झरोखे पर खड़े रहना
अंत के पहले का विषाद नही तो और क्या है?

तुम्हारे होने का न तो हवा को पता है न ही धूप को

तुम्हारी झुलसती अंतरात्मा और पथराती देह क्या मोल देगी मेरे शब्दों का,

क्यूंकि धूप नही कहती की उसके पास रौशनी है
और आग की उसके पास लपटें.

Friday, December 12, 2008

यूँ ही

मैंने सोचा
कि उसके चले जाने से,
जो कांपती सी खाली जगह बची है,
वहाँ कुछ शब्द रख दूँ,
फिर मन में आया,
कि खुरदरे संबंधों और अपमानित आशाओं को क्या नाम दूँगा?

क्यूंकि जाले सिर्फ़ कमरों में ही नहीं,
मन और शरीर पर भी तो उग आए हैं!

मेरे शब्दकोष पर लगे ताले कि चाबी
तो बरसों पहले ही खो दी थी उसने,
पता नही यह जगह
उसे अब याद भी होगी या नही.
इस ताले में रखे शब्द
मुझे उससे जोड़ेंगे या स्पंदित होकर ख़ुद भी खो जायेंगे.

मुझे मालूम है कि
बिना शब्दों के
न तो वो बचेगी न ही ये स्पंदन,
जो बचेगा वो मैं ही होऊंगा ,
क्यूंकि उजाले और मटियाले कि महक बताने के लिए
किसी को तो बचना होगा
शब्दों कि जगह.

Wednesday, November 26, 2008

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.

हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.

ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.

सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.

उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.

तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.

मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.

ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.

Thursday, October 23, 2008

ग़ज़ल

इकरारे-गुनाह इश्क है शरहे-हयात अब,
नज़रों से रह गई जो, क्या हो वो बात अब.

जो जिस्म नाजनीं था निगारे नज़रनवाज़,
वो है निगाह में बर्के-सिफात अब.

गम से जो छूटा हूँ तो ये गम है मुझे,
शबे-अलम से क्यूँकर है नजात अब.

किसने हकीकतों के खज़ाने लुटा दिए,
बेमाया इस कदर है मेरी सौगात अब.

माना तेरे करम में कोई कमी नही,
पर पहले सी है कहाँ मेरी औकात अब.

नींद आ चली है बशर, तबीयत हरी नहीं,
दुनिया है बेठिकाना, क्या आबे-हयात अब.




बशर - my pen name
शरहे-हयात - जीवन का निचोड़
शबे-अलम - दुःख की रात
निगारे नज़रनवाज़- नज़र को मासूम लगने वाला
बर्के-सिफात - बिजलियाँ गिराने वाला
बेमया - तुच्छ

Wednesday, October 22, 2008

गली दूर तक खामोश है.

गली में आज सन्नाटा है,
ना ही कोई आहट ना ही कोई शोर,
मेरी हाथ की घड़ी में
शाम अभी बस ढली ही है,
फिर गली इतनी गुमसुम क्यों

मिसेज गिल भी अपनी कुर्सी डाले नही मिली
बच्चों का शोर, किलकारियां,
आज क्या हुआ है यहाँ

लड़कियों की चहलकदमी और उनके लिए
नुक्कड़ पर
हर शाम जमने वाली लड़कों की टोली
जिनका चेहरा एक आदत सी बन गई है
अपने वक्त पर नही मिले.
आज न कोई पार्किंग को लेकर झगड़ा,
न कोई खुले मेंनहाल पर चर्चा.

पूरी गली दूर तक खामोश है
अलबत्ता छोटे मन्दिर में कोई दिए जला गया है
दिवाली भी तो नज़दीक है,
देर रात तक टेलीविज़न से आती
रीयलिटी शो की आवाजें
सन्नाटा लील गया है आज.
गली के मोड़ का पनवाडी भी नदारद है,

सोचा थोड़ा आगे तक हो आऊं
शायद कोई मिल जाए
पर यहाँ भी
गली के कैनवास पर
अंधेरे का रंग लिए सन्नाटा हर कोने पसरा पड़ा है.

श्रीवास्तव जी के घर के बाहर
कुछ चप्पलें उतरी हुई हैं,

सुख हो ! रब्बा

तभी रात का पहरेदार दिखा,
उसने भी दूर से ही बुझा सा सलाम किया,
मैंने उससे पुछा,
आज रौनक को क्या हुआ,

ओह!!!
कल गली के लड़के मुंबई गए थे- घूमने,
वहां के लोगों ने
दो को मार दिया.

Monday, October 20, 2008

कैसी हो?

कैसी हो?
क्या अब भी क्षुब्द और असयंमित

मैं आकाश हूँ,
इंतज़ार में उस चिडिया के बड़े होने का,
जो पंख फैलाए
और उड़ सके मेरी हवा में.
मैं समुन्द्र हूँ,
इंतज़ार में उस बारिश की बूँद का,
जो मुझमें गिरे
और मेरा ही रूप हो जाए.
मैं तिनका हूँ,
घास का,
प्रतीक्षक उस ओस की बूँद का,
जो धरती में विलीन होने से पहले,
कुछ देर मेरी नोक पर ठहरे,
विश्राम करे.
वो चिडिया, वो बारिश,
वो ओस की बूँद
प्रतीक हैं तुम्हारे,
सिर्फ़ तुम्हारे,
क्या तुम आओगी?

Thursday, October 16, 2008

शायद प्रेम में यही होता है

मैं तुम्हे देख नही सकता
जबकि तुम मुझे चारों तरफ से घेरे हो
मैं
एक पुराने मकान की तरह हूँ
जहाँ बरसों बाद कोई रहने आया है
कुछ नए फूल,
सफ़ेद बादल और उजली धूप लिए
तुम्हारे साथ आये हैं
कई अदृश्य जन्मान्तर
आशा का एक महाद्वीप
आराधना के लिए जलता हुआ एक दीप


शायद प्रेम में यही होता है
सारा ब्रह्माण्ड यूँ ही मिल जाता है
मैं अपने रग रग में महसूस कर सकता हूँ तुम्हे
छू सकता हूँ,
तुम्हारे साथ भीग सकता हूँ,
जाग सकता हूँ, सो सकता हूँ,
तुम निश्छल आकाश हो
एक अबोध बच्चे की मासूम प्रार्थना हो
तुम धरती हो
बारिश हो
हरियाली हो
तुम मुझे भूल न जाना
एक अकस्मात अतिथि की तरह
जो संयोगवश
मेरे दरवाजे पे आ गया.

Monday, October 13, 2008

मैं खिन्न हूँ

मैं खिन्न हूँ, क्यूंकि मैं हिंदू हूँ, मुझमे और आतंकियों में अब कोई फर्क नही, मेरी गीता आज मुझे गैर हिन्दुओं का घर जलाने को कहती है, वाल्मीकि की रामायण अब झूठी हो गई है, क्यूंकि राम अब पुरुषोतम नहीं रहे. बजरंगबली तो अब घरों को भी जलाने लगे हैं. हिंदू होना मेरे सिर को अब झुकाने लगा है. महाराष्ट्र में अब मैं मराठा हूँ और उड़ीसा में बजरंगी. हिन्दुत्व शब्द अब मेरी शब्दावली में नहीं रह गया. पर माँ की पढ़ाई हिन्दुत्व की बातों में तो यह अलगाव नही था. मैंने जो गीता छानी उसमे भी यह ज़िक्र नही था, या फिर मैं कोई पन्ना पढ़ना भूल गया? जहाँ लिखा था जो हिंदू नही उसका घर फूँक दो और जलने से भी जो बच जाए उसे मार दो. यह शायद कोई नई गीता लिखी जा रही है, अगर ऐसा है तो मैं नही चाहूँगा की मेरी आने वाली नस्ले उसे पढे और राम, शिव, बजरंग बलि या कृष्ण को कोसे.
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फिर इक बार मुझे सूली चढाया जाए,
मेरे सलीब को काँधे उठाया जाए.

इस नफ़रतो-गारत की दुनिया में खुदा,
मेरे वजूद का एहसास कराया जाए.

आँख रोती है, दिल सिसकता है बहुत,
तेरे बच्चों को फिर राह पे लाया जाए.

मेरा जिस्म और लहू बंट गया है तमाम,
हो अगर तो एक और ईसा को बुलाया जाए.

तू ही मौला है, तू ही ईसा, तू ही भगवान् ! पिता,
कैसे रूठे हुए बच्चों को समझाया जाए.

कब कहा था मैंने की मेरा मजहब जुदा है,
फिर इक बार मेरे वचनों को दोहराया जाए.