ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.
हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.
ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.
सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.
उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.
तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.
मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.
ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.
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Wednesday, November 26, 2008
Wednesday, October 1, 2008
यकीं दिलाओ
गर तुम इतना यकीं दिलाओ
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी
तो अपनी पलकें दरे राह बिछा कर रखूँ
इक दिया जलता हुआ
गली के मोड़ पर रख आऊं जाकर
और चाँद से थोडी चांदनी लेकर
घर को रौशन कर लूँ
तुम आओ तो
फूलों से खुशबू चुराकर
महका दूँ चमन सारा,
अपने आंसुओं को बचा कर रखूं
तुम्हारे हर शिकवे को धोने के लिए
शब् -ऐ-हिज्राँ को न फटकने दूँ फ़िर से
हर आलम को अपनी हाथों से सवारू.
तुम्हारे चेहरे पे काजल से तिल कर दूँ
हर बला को दूर से ही रुखसत कर दूँ
तुम्हारे आने पे हर जगह फसल-ऐ-गुल होगी
न हार का दुःख होगा,
न जीत की खुशी होगी.
मेरी तमन्ना
जो कब से धूल में पड़ी थी देखो
तुम्हारा नाम सुनते ही आँगन में चली आई है
राह तक रही है तुम्हारी,
ख्वाब सजा रही है देखो
तुम आओ तो
ये मायूसी ये गम
जो कब से घर किए हैं मेरे घर में
इन्हे रुखसत कर दूँ.
मुझे अभी मन्दिर भी जाना है
मन्नत के लिए
इक दिया जलाना है
जिंदगी के लिए
बस! मुझे तुम इतना यकीं दिलाओ
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी
तो अपनी पलकें दरे राह बिछा कर रखूँ
इक दिया जलता हुआ
गली के मोड़ पर रख आऊं जाकर
और चाँद से थोडी चांदनी लेकर
घर को रौशन कर लूँ
तुम आओ तो
फूलों से खुशबू चुराकर
महका दूँ चमन सारा,
अपने आंसुओं को बचा कर रखूं
तुम्हारे हर शिकवे को धोने के लिए
शब् -ऐ-हिज्राँ को न फटकने दूँ फ़िर से
हर आलम को अपनी हाथों से सवारू.
तुम्हारे चेहरे पे काजल से तिल कर दूँ
हर बला को दूर से ही रुखसत कर दूँ
तुम्हारे आने पे हर जगह फसल-ऐ-गुल होगी
न हार का दुःख होगा,
न जीत की खुशी होगी.
मेरी तमन्ना
जो कब से धूल में पड़ी थी देखो
तुम्हारा नाम सुनते ही आँगन में चली आई है
राह तक रही है तुम्हारी,
ख्वाब सजा रही है देखो
तुम आओ तो
ये मायूसी ये गम
जो कब से घर किए हैं मेरे घर में
इन्हे रुखसत कर दूँ.
मुझे अभी मन्दिर भी जाना है
मन्नत के लिए
इक दिया जलाना है
जिंदगी के लिए
बस! मुझे तुम इतना यकीं दिलाओ
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी
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