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Tuesday, April 28, 2020

मुई रात

कुछ तो अटका है
हलक में शायद,
जाम है धड़कन भी
भारी सीना है
मद्धम है सांस भी शायद।

लब सूखे हैं आंखे नाशाद हैं
नींद भी कमबख्त कबसे नाराज़ है
चैन भी है बेचैन आजकल
बहुत कुछ है अजीब आजकल।

कुछ तो तरकीब हो कोई
कुछ तो तरीका हो,
कि इस मुई रात को भी
नींद आए
और इस सुबह का भी सवेरा हो।

- मनुज मेहता

Friday, December 20, 2019

रेत का शहर


उस कोने के कमरे में जाने से
अब जी घबराता है।
तुमसे पड़ी चादरों पे सिलवटें
साफ नज़र आती हैं अब भी।

वो दरवाज़ा जो चीख़ के बंद होता था
तुम्हे सुनने के लिए चुपचाप खड़ा है।

वो मुंढेर पर पड़े मटके
अब भी वहीं है तुम्हारे हाथों
के निशान लिए।

वो बॉनफायर की जगह
वो लिहाफ, वो सीढियां
देखती हैं एक टक मुझे

वो बच्चे जो कभी लिपटते थे तुमसे
पूछते हैं तुमको हर बार
मैं टॉफियों से बहला देता हूँ उनको।

हो सके तो चलो इक बार फिर
जो रात छोड़ आये थे रेत पर
उसको सुबह दे दें।

अकेले
उस रेत के शहर जाने से अब जी घबराता है।