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Monday, April 5, 2021

जाने के बाद

 


सब कुछ वैसा ही रहा,

धरती, आकाश, जंगल

और वो खुद भी!

शांत, स्थिर और सुंदर!


टूटा कुछ मेरे अंदर 

पर

किसी ने आवाज़ नहीं सुनी!

कुछ बिखरा अचानक,

पर किसी ने नहीं देखा!

कुछ खो गया,

किसी ने ध्यान नहीं दिया!

उसने भी नहीं;

चले जाने के बाद।



~मनुज मेहता



Tuesday, March 3, 2020

जन्मों की डोर

कई जन्मों की डोर हैं हम
मैं और तुम
जन्मों साथ चले हैं
सदियों के फ़ासले तय किये है हमने

एक जन्म
जब गीज़ा की मीनार तले
रेत पर खड़ी थी तुम
मैं खानाबदोश चला आया था ऊँठ लिए।
काले लिबास में ढंकी
तुम्हारी आँखों का प्यार वही था
जब
घूंघट के छोर से देखा था तुमने
सफेद कुर्ते और धोती में
मुझे अगले जन्म में।

इस जन्म
रेत पे जहां
तुमने पैरों से निशान बनाये
उन्ही पर रख के पैर
थामा है तुमको।

इस डोर को
थामे रखो।
जन्मों के धागों से बंधे रिश्ते
यूँ नही टूटा करते।

-मनुज मेहता

Friday, January 10, 2020

पहाड़ी शहर

कुछ देर के लिए ही आये थे
वक्त था हमारे पास और तुम्हे देखना था वो
पहाड़ी शहर

झील के पास भुट्टे अभी भुन ही रहे थे
कि बरसात की बूंदों ने भिगो दिया था हमको।

तुम अटक के रह गयी थी बाजार के उस तरफ
बिना छतरी।

मैं इंतेज़ार में खड़ा रहा बड़ी देर उस गुम्बद तले जहां सारा शहर ही चला आया था।
जब बरसात न थमी न ही हल्की हुई, तुम्हे ढूंढते हुए जा पहुंचा था तुम्हारे पास।
तुम दूर से मुस्कुरा दीं थी।

तुम्हे बरसात पसंद आ रही थी उस रोज़।

और उस एक छतरी और बहते हुए पानी में भीगते हुए वापिस आ गए थे गुम्बद तले।

तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा
तैरता है आंखों में।

Saturday, February 21, 2009

दरवाज़ा

जब तुम खोलोगी दरवाज़ा,
तो तुम्हारे पीछे का वो आला
अपनी कितोबों की आभा
उड़ेल देगा तुम पर,

खिड़की की धूप
रौशन कर देगी तुमको
और हवा
न जाने तुम्हारी कितनी ही खुशबूएं ले आएँगी मुझ तक

चिड़ियों की न जाने कितनी ही आवाजें
तुम्हारे साथ मुझे अंगीकार करने को आतुर होंगी,

और पलाश की अन्तिम किरण
हमारे ही कमरे में बुझेगी.

तुम्हारी हँसी जैसे दिन के हर यौवन को
अपनी अंजलि से उछाल देगी मेरी तरफ़.

और जब तुम्हारे होठों की परछाइयां झुकेंगी मेरे होठों पर
सांझ का रंग डूब जाएगा.

तब आनंत में एक खिड़की खुलेगी
और हमारी देह को दीप्त करती हुई
अन्तरिक्ष में प्रेम की जगह बनाएगी.

अनंत तारों एक बिछौना होगा
और हमारी देह
एक ज्वलंत पुष्प!

Wednesday, November 26, 2008

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.

हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.

ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.

सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.

उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.

तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.

मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.

ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.

Thursday, October 16, 2008

शायद प्रेम में यही होता है

मैं तुम्हे देख नही सकता
जबकि तुम मुझे चारों तरफ से घेरे हो
मैं
एक पुराने मकान की तरह हूँ
जहाँ बरसों बाद कोई रहने आया है
कुछ नए फूल,
सफ़ेद बादल और उजली धूप लिए
तुम्हारे साथ आये हैं
कई अदृश्य जन्मान्तर
आशा का एक महाद्वीप
आराधना के लिए जलता हुआ एक दीप


शायद प्रेम में यही होता है
सारा ब्रह्माण्ड यूँ ही मिल जाता है
मैं अपने रग रग में महसूस कर सकता हूँ तुम्हे
छू सकता हूँ,
तुम्हारे साथ भीग सकता हूँ,
जाग सकता हूँ, सो सकता हूँ,
तुम निश्छल आकाश हो
एक अबोध बच्चे की मासूम प्रार्थना हो
तुम धरती हो
बारिश हो
हरियाली हो
तुम मुझे भूल न जाना
एक अकस्मात अतिथि की तरह
जो संयोगवश
मेरे दरवाजे पे आ गया.

Wednesday, October 1, 2008

यकीं दिलाओ

गर तुम इतना यकीं दिलाओ
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी
तो अपनी पलकें दरे राह बिछा कर रखूँ
इक दिया जलता हुआ
गली के मोड़ पर रख आऊं जाकर
और चाँद से थोडी चांदनी लेकर
घर को रौशन कर लूँ

तुम आओ तो
फूलों से खुशबू चुराकर
महका दूँ चमन सारा,
अपने आंसुओं को बचा कर रखूं
तुम्हारे हर शिकवे को धोने के लिए
शब् -ऐ-हिज्राँ को न फटकने दूँ फ़िर से
हर आलम को अपनी हाथों से सवारू.

तुम्हारे चेहरे पे काजल से तिल कर दूँ
हर बला को दूर से ही रुखसत कर दूँ
तुम्हारे आने पे हर जगह फसल-ऐ-गुल होगी
न हार का दुःख होगा,
न जीत की खुशी होगी.

मेरी तमन्ना
जो कब से धूल में पड़ी थी देखो
तुम्हारा नाम सुनते ही आँगन में चली आई है
राह तक रही है तुम्हारी,
ख्वाब सजा रही है देखो

तुम आओ तो
ये मायूसी ये गम
जो कब से घर किए हैं मेरे घर में
इन्हे रुखसत कर दूँ.
मुझे अभी मन्दिर भी जाना है
मन्नत के लिए
इक दिया जलाना है
जिंदगी के लिए
बस! मुझे तुम इतना यकीं दिलाओ
कि तुम मेरी ज़िन्दगी में आओगी