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Saturday, October 24, 2020

कितनी परतें

कितनी परतें चढ़ा दी है परतों पर

पहुंचूं तुम तक तो भला कैसे

कोई सिरा हाथ नहीं आता।


वक्त को मैंने तो थाम के रखा है

तुम्हारे हाथो से फिसल रहा है

लम्हा लम्हा, कतरा कतरा।


गुज़रे वक्त को रोज़ संवारता हूं

छांटता हूं पीले लम्हों को

मुरझा रहे हैं, 

हर पल गुजरते वक्त के साथ।

रोज़ कोशिश करता हूं, संभालूं।

शायद तुम्हारे हाथों से जी जाएं।


अपनी सांस की हवा दे दो

अपनी उंगलियों की छुअन

अधूरे लम्हे, नए की आस में

शायद फिर हरे हो जाएं।


~मनुज मेहता

Tuesday, March 3, 2020

सिर्फ़ तुम

मैंने जब तुम्हारे बालों को छुआ
तुम मुड़ी, थोड़ा हंसी, मैं भी हँसा
फिर हमारे साथ
झील, वादी, पहाड़, बादल
फूल, कोंपल, शहर, जंगल
सब के सब हंसने लगे
हमारी हंसी ने भर दिया इक रंग
रेत को कर दिया सुनहरा
चाँद को और रौशन।

फिर तुमने छुआ
सिर्फ मेरे होंठों या
हाथों-भर को नहीं
तुमने छुआ
मेरे अंतर्मन को
जन्म जन्मांतरों को
सुख और दुःख को।
खुशी और वेदना को।
तुमने
सिर्फ तुमने
तुम्हीं ने।

हम दोनों का होना ज़रूरी है
हम दोनों के लिए।

-मनुज मेहता

जन्मों की डोर

कई जन्मों की डोर हैं हम
मैं और तुम
जन्मों साथ चले हैं
सदियों के फ़ासले तय किये है हमने

एक जन्म
जब गीज़ा की मीनार तले
रेत पर खड़ी थी तुम
मैं खानाबदोश चला आया था ऊँठ लिए।
काले लिबास में ढंकी
तुम्हारी आँखों का प्यार वही था
जब
घूंघट के छोर से देखा था तुमने
सफेद कुर्ते और धोती में
मुझे अगले जन्म में।

इस जन्म
रेत पे जहां
तुमने पैरों से निशान बनाये
उन्ही पर रख के पैर
थामा है तुमको।

इस डोर को
थामे रखो।
जन्मों के धागों से बंधे रिश्ते
यूँ नही टूटा करते।

-मनुज मेहता

Tuesday, October 7, 2008

तुम्हारा नाम

कल रात कुछ सपने
अपनी धुन में भागते, दौड़ते
अठखेलियाँ करते
मेरे सिरहाने आ पहुंचे,
बहुत प्यारे, बहुत नाज़ुक,
बहुत चंचल,
कुछ उम्र में बड़े कुछ बच्चे भी
कुछ अपनों और कुछ बेगानों के
कुछ शोख, कुछ बहुत शर्मीले,
मैंने प्यार से उन्हें सहलाया
जगह दी अपने करीब,
एक नाज़ुक ख़ूबसूरत सा सपना
उठ खड़ा हुआ बोलने को,
मैं सुन न पाया कुछ और
बस इतना ही सुना की कहीं किसी जगह
उसने लिया तुम्हारा नाम