गली में आज सन्नाटा है,
ना ही कोई आहट ना ही कोई शोर,
मेरी हाथ की घड़ी में
शाम अभी बस ढली ही है,
फिर गली इतनी गुमसुम क्यों
मिसेज गिल भी अपनी कुर्सी डाले नही मिली
बच्चों का शोर, किलकारियां,
आज क्या हुआ है यहाँ
लड़कियों की चहलकदमी और उनके लिए
नुक्कड़ पर
हर शाम जमने वाली लड़कों की टोली
जिनका चेहरा एक आदत सी बन गई है
अपने वक्त पर नही मिले.
आज न कोई पार्किंग को लेकर झगड़ा,
न कोई खुले मेंनहाल पर चर्चा.
पूरी गली दूर तक खामोश है
अलबत्ता छोटे मन्दिर में कोई दिए जला गया है
दिवाली भी तो नज़दीक है,
देर रात तक टेलीविज़न से आती
रीयलिटी शो की आवाजें
सन्नाटा लील गया है आज.
गली के मोड़ का पनवाडी भी नदारद है,
सोचा थोड़ा आगे तक हो आऊं
शायद कोई मिल जाए
पर यहाँ भी
गली के कैनवास पर
अंधेरे का रंग लिए सन्नाटा हर कोने पसरा पड़ा है.
श्रीवास्तव जी के घर के बाहर
कुछ चप्पलें उतरी हुई हैं,
सुख हो ! रब्बा
तभी रात का पहरेदार दिखा,
उसने भी दूर से ही बुझा सा सलाम किया,
मैंने उससे पुछा,
आज रौनक को क्या हुआ,
ओह!!!
कल गली के लड़के मुंबई गए थे- घूमने,
वहां के लोगों ने
दो को मार दिया.
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Wednesday, October 22, 2008
गली दूर तक खामोश है.
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Monday, September 29, 2008
आओ आलिंगन करें
आओ आलिंगन करें
जैसे फूल करता है फूल को
सूरज आभा को और रात चाँदनी को !
आओ आलिंगन करें
जैसे बारिश करती है
धरा को, पहाड़ को पेड़ को, पौधे को
और सम्पूर्ण अंतर्मन को !
आओ आलिंगन करें
क्यूंकि प्रेम से ही सब विद्यमान है
मैं और तुम भी!
दिन और वर्ष सब छूट जायेंगे,
और आँगन में पड़ी साँझ को कहीं लिखा नही जाएगा,
चिडियों की अनगिनत आवाजें बेमानी होंगी
और तुम्हरी देह से टकराती धूप
और आद्र अधर कहीं खो जायेंगे!
आओ आलिंगन करें
क्यूंकि यह रितुगान है,
बुदबुदाते हुए होठों की कामना है,
यह नई कोपलों का स्पष्ट आकार है,
ये वसंत की शुरुआत है
ये झिझकते स्पर्श से
तपते हुए संसार का आभास है
ये पतझड़ से नग्न हुए पेडों पर
नए जीवन का संचार है.
जैसे फूल करता है फूल को
सूरज आभा को और रात चाँदनी को !
आओ आलिंगन करें
जैसे बारिश करती है
धरा को, पहाड़ को पेड़ को, पौधे को
और सम्पूर्ण अंतर्मन को !
आओ आलिंगन करें
क्यूंकि प्रेम से ही सब विद्यमान है
मैं और तुम भी!
दिन और वर्ष सब छूट जायेंगे,
और आँगन में पड़ी साँझ को कहीं लिखा नही जाएगा,
चिडियों की अनगिनत आवाजें बेमानी होंगी
और तुम्हरी देह से टकराती धूप
और आद्र अधर कहीं खो जायेंगे!
आओ आलिंगन करें
क्यूंकि यह रितुगान है,
बुदबुदाते हुए होठों की कामना है,
यह नई कोपलों का स्पष्ट आकार है,
ये वसंत की शुरुआत है
ये झिझकते स्पर्श से
तपते हुए संसार का आभास है
ये पतझड़ से नग्न हुए पेडों पर
नए जीवन का संचार है.
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