Saturday, October 24, 2020

कितनी परतें

कितनी परतें चढ़ा दी है परतों पर

पहुंचूं तुम तक तो भला कैसे

कोई सिरा हाथ नहीं आता।


वक्त को मैंने तो थाम के रखा है

तुम्हारे हाथो से फिसल रहा है

लम्हा लम्हा, कतरा कतरा।


गुज़रे वक्त को रोज़ संवारता हूं

छांटता हूं पीले लम्हों को

मुरझा रहे हैं, 

हर पल गुजरते वक्त के साथ।

रोज़ कोशिश करता हूं, संभालूं।

शायद तुम्हारे हाथों से जी जाएं।


अपनी सांस की हवा दे दो

अपनी उंगलियों की छुअन

अधूरे लम्हे, नए की आस में

शायद फिर हरे हो जाएं।


~मनुज मेहता

Tuesday, April 28, 2020

मुई रात

कुछ तो अटका है
हलक में शायद,
जाम है धड़कन भी
भारी सीना है
मद्धम है सांस भी शायद।

लब सूखे हैं आंखे नाशाद हैं
नींद भी कमबख्त कबसे नाराज़ है
चैन भी है बेचैन आजकल
बहुत कुछ है अजीब आजकल।

कुछ तो तरकीब हो कोई
कुछ तो तरीका हो,
कि इस मुई रात को भी
नींद आए
और इस सुबह का भी सवेरा हो।

- मनुज मेहता

Tuesday, March 3, 2020

सिर्फ़ तुम

मैंने जब तुम्हारे बालों को छुआ
तुम मुड़ी, थोड़ा हंसी, मैं भी हँसा
फिर हमारे साथ
झील, वादी, पहाड़, बादल
फूल, कोंपल, शहर, जंगल
सब के सब हंसने लगे
हमारी हंसी ने भर दिया इक रंग
रेत को कर दिया सुनहरा
चाँद को और रौशन।

फिर तुमने छुआ
सिर्फ मेरे होंठों या
हाथों-भर को नहीं
तुमने छुआ
मेरे अंतर्मन को
जन्म जन्मांतरों को
सुख और दुःख को।
खुशी और वेदना को।
तुमने
सिर्फ तुमने
तुम्हीं ने।

हम दोनों का होना ज़रूरी है
हम दोनों के लिए।

-मनुज मेहता

जन्मों की डोर

कई जन्मों की डोर हैं हम
मैं और तुम
जन्मों साथ चले हैं
सदियों के फ़ासले तय किये है हमने

एक जन्म
जब गीज़ा की मीनार तले
रेत पर खड़ी थी तुम
मैं खानाबदोश चला आया था ऊँठ लिए।
काले लिबास में ढंकी
तुम्हारी आँखों का प्यार वही था
जब
घूंघट के छोर से देखा था तुमने
सफेद कुर्ते और धोती में
मुझे अगले जन्म में।

इस जन्म
रेत पे जहां
तुमने पैरों से निशान बनाये
उन्ही पर रख के पैर
थामा है तुमको।

इस डोर को
थामे रखो।
जन्मों के धागों से बंधे रिश्ते
यूँ नही टूटा करते।

-मनुज मेहता

Friday, January 10, 2020

पहाड़ी शहर

कुछ देर के लिए ही आये थे
वक्त था हमारे पास और तुम्हे देखना था वो
पहाड़ी शहर

झील के पास भुट्टे अभी भुन ही रहे थे
कि बरसात की बूंदों ने भिगो दिया था हमको।

तुम अटक के रह गयी थी बाजार के उस तरफ
बिना छतरी।

मैं इंतेज़ार में खड़ा रहा बड़ी देर उस गुम्बद तले जहां सारा शहर ही चला आया था।
जब बरसात न थमी न ही हल्की हुई, तुम्हे ढूंढते हुए जा पहुंचा था तुम्हारे पास।
तुम दूर से मुस्कुरा दीं थी।

तुम्हे बरसात पसंद आ रही थी उस रोज़।

और उस एक छतरी और बहते हुए पानी में भीगते हुए वापिस आ गए थे गुम्बद तले।

तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा
तैरता है आंखों में।