इकरारे-गुनाह इश्क है शरहे-हयात अब,
नज़रों से रह गई जो, क्या हो वो बात अब.
जो जिस्म नाजनीं था निगारे नज़रनवाज़,
वो है निगाह में बर्के-सिफात अब.
गम से जो छूटा हूँ तो ये गम है मुझे,
शबे-अलम से क्यूँकर है नजात अब.
किसने हकीकतों के खज़ाने लुटा दिए,
बेमाया इस कदर है मेरी सौगात अब.
माना तेरे करम में कोई कमी नही,
पर पहले सी है कहाँ मेरी औकात अब.
नींद आ चली है बशर, तबीयत हरी नहीं,
दुनिया है बेठिकाना, क्या आबे-हयात अब.
बशर - my pen name
शरहे-हयात - जीवन का निचोड़
शबे-अलम - दुःख की रात
निगारे नज़रनवाज़- नज़र को मासूम लगने वाला
बर्के-सिफात - बिजलियाँ गिराने वाला
बेमया - तुच्छ