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Monday, October 20, 2008

कैसी हो?

कैसी हो?
क्या अब भी क्षुब्द और असयंमित

मैं आकाश हूँ,
इंतज़ार में उस चिडिया के बड़े होने का,
जो पंख फैलाए
और उड़ सके मेरी हवा में.
मैं समुन्द्र हूँ,
इंतज़ार में उस बारिश की बूँद का,
जो मुझमें गिरे
और मेरा ही रूप हो जाए.
मैं तिनका हूँ,
घास का,
प्रतीक्षक उस ओस की बूँद का,
जो धरती में विलीन होने से पहले,
कुछ देर मेरी नोक पर ठहरे,
विश्राम करे.
वो चिडिया, वो बारिश,
वो ओस की बूँद
प्रतीक हैं तुम्हारे,
सिर्फ़ तुम्हारे,
क्या तुम आओगी?