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Wednesday, November 26, 2008

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.

हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.

ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.

सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.

उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.

तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.

मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.

ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.