Saturday, May 31, 2014

पुरानी किताब

आओ वो पुरानी किताब ढूंढें,
जिसके सफों में बरसों पहले,
एक गुलाब रखा था हमने, 
आओ! उसे पानी दे दें 
मुरझा गया है शायद.

सर्दी की वो सर्द सुबहें भी,
कितनी गर्म थीं उस शॉल के अंदर
जिसे हम अक्सर ओढ़ लिया करते थे 
आओ! वो शॉल ढूंढें.

कॉफी होम के वो दिन, याद हैं ना,
कितने आसान से थे,
तुम्हारा आना, मेरा मिलना
और शाम का हंसते हुए चुपचाप ढल जाना
आओ! उन हंसती शामों की सुबह ढूंढें.

आओ! वो पुरानी किताब ढूंढें!

~मनुज मेहता

Friday, June 5, 2009

ज़िन्दगी

मैं खींच लूँगा आकाश से नीली चादर
और सफ़ेद बादलों से नरम तकिया,

घास से मांग लूँगा हरा कालीन
और पेड़ से छप्पर,

तुम्हारे लिए सब कुछ वैसा ही रखूँगा,

शरद के आकाश में आधा चाँद,
झींगुरों का संगीत
और जुगनुओं की टिमटिमाती रौशनी.

रात को लगने वाली प्यास के लिए पास की नदी
और तुम्हे रिझाने के लिए कुछ नक्षत्र और आकाशगंगा.

हवा भी मंद मंद तुम्हारे बालों को सहलाती चलेगी.

जहाँ जहाँ तुम्हारा तपता स्पर्श होगा वही फूटेगी ईब
तुम्हारी आधी मुंदी आँखों में मेरे जगे स्वप्न तैर जायेंगे
और एक नयी कविता लिखेंगे

और तुम्हारी रौशनी में
मेरे कुछ अँधेरे शब्द पा जायेंगे ज़िन्दगी.

Saturday, February 21, 2009

दरवाज़ा

जब तुम खोलोगी दरवाज़ा,
तो तुम्हारे पीछे का वो आला
अपनी कितोबों की आभा
उड़ेल देगा तुम पर,

खिड़की की धूप
रौशन कर देगी तुमको
और हवा
न जाने तुम्हारी कितनी ही खुशबूएं ले आएँगी मुझ तक

चिड़ियों की न जाने कितनी ही आवाजें
तुम्हारे साथ मुझे अंगीकार करने को आतुर होंगी,

और पलाश की अन्तिम किरण
हमारे ही कमरे में बुझेगी.

तुम्हारी हँसी जैसे दिन के हर यौवन को
अपनी अंजलि से उछाल देगी मेरी तरफ़.

और जब तुम्हारे होठों की परछाइयां झुकेंगी मेरे होठों पर
सांझ का रंग डूब जाएगा.

तब आनंत में एक खिड़की खुलेगी
और हमारी देह को दीप्त करती हुई
अन्तरिक्ष में प्रेम की जगह बनाएगी.

अनंत तारों एक बिछौना होगा
और हमारी देह
एक ज्वलंत पुष्प!

Sunday, January 18, 2009

हारे हुए शब्दों का मोल

सुनो, तुम मेरे शब्दों का मोल क्या दोगे?
कहाँ हैं तुम्हारी जेब में आकाश गंगा और हजारों सितारे?

बिस्तर की कितनी ही सिलवटों में
धरती,आकाश
और अन्जले चिरागों को समेटा है मैंने.

तुम्हारे अस्वीकार के बाद
उन हारे हुए शब्दों का क्या मोल?

डूबते हुए अंधेरे के अदृश्य कम्पन में
चाँद मेरी आंखों में कई बार डूबा है,

तुम्हारे बदलते रंगों से ,
तुम्हारी त्वचा के उजास से
अंधेरे और उजाले के बीच की खामोशी से.
अपने अंगों से,
अपनी देह से,
अपने मन से,
अपने ही भार से,
और तुम्हारे मर्दन से,
डर लगता है

तुम्हारा चुप रहकर मेरे निराश झरोखे पर खड़े रहना
अंत के पहले का विषाद नही तो और क्या है?

तुम्हारे होने का न तो हवा को पता है न ही धूप को

तुम्हारी झुलसती अंतरात्मा और पथराती देह क्या मोल देगी मेरे शब्दों का,

क्यूंकि धूप नही कहती की उसके पास रौशनी है
और आग की उसके पास लपटें.

Friday, December 12, 2008

यूँ ही

मैंने सोचा
कि उसके चले जाने से,
जो कांपती सी खाली जगह बची है,
वहाँ कुछ शब्द रख दूँ,
फिर मन में आया,
कि खुरदरे संबंधों और अपमानित आशाओं को क्या नाम दूँगा?

क्यूंकि जाले सिर्फ़ कमरों में ही नहीं,
मन और शरीर पर भी तो उग आए हैं!

मेरे शब्दकोष पर लगे ताले कि चाबी
तो बरसों पहले ही खो दी थी उसने,
पता नही यह जगह
उसे अब याद भी होगी या नही.
इस ताले में रखे शब्द
मुझे उससे जोड़ेंगे या स्पंदित होकर ख़ुद भी खो जायेंगे.

मुझे मालूम है कि
बिना शब्दों के
न तो वो बचेगी न ही ये स्पंदन,
जो बचेगा वो मैं ही होऊंगा ,
क्यूंकि उजाले और मटियाले कि महक बताने के लिए
किसी को तो बचना होगा
शब्दों कि जगह.

Wednesday, November 26, 2008

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.

हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.

ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.

सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.

उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.

तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.

मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.

ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.