मेरा कमरा
Monday, October 11, 2010
Zindagi
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Friday, June 5, 2009
ज़िन्दगी
मैं खींच लूँगा आकाश से नीली चादर
और सफ़ेद बादलों से नरम तकिया,
घास से मांग लूँगा हरा कालीन
और पेड़ से छप्पर,
तुम्हारे लिए सब कुछ वैसा ही रखूँगा,
शरद के आकाश में आधा चाँद,
झींगुरों का संगीत
और जुगनुओं की टिमटिमाती रौशनी.
रात को लगने वाली प्यास के लिए पास की नदी
और तुम्हे रिझाने के लिए कुछ नक्षत्र और आकाशगंगा.
हवा भी मंद मंद तुम्हारे बालों को सहलाती चलेगी.
जहाँ जहाँ तुम्हारा तपता स्पर्श होगा वही फूटेगी ईब
तुम्हारी आधी मुंदी आँखों में मेरे जगे स्वप्न तैर जायेंगे
और एक नयी कविता लिखेंगे
और तुम्हारी रौशनी में
मेरे कुछ अँधेरे शब्द पा जायेंगे ज़िन्दगी.
और सफ़ेद बादलों से नरम तकिया,
घास से मांग लूँगा हरा कालीन
और पेड़ से छप्पर,
तुम्हारे लिए सब कुछ वैसा ही रखूँगा,
शरद के आकाश में आधा चाँद,
झींगुरों का संगीत
और जुगनुओं की टिमटिमाती रौशनी.
रात को लगने वाली प्यास के लिए पास की नदी
और तुम्हे रिझाने के लिए कुछ नक्षत्र और आकाशगंगा.
हवा भी मंद मंद तुम्हारे बालों को सहलाती चलेगी.
जहाँ जहाँ तुम्हारा तपता स्पर्श होगा वही फूटेगी ईब
तुम्हारी आधी मुंदी आँखों में मेरे जगे स्वप्न तैर जायेंगे
और एक नयी कविता लिखेंगे
और तुम्हारी रौशनी में
मेरे कुछ अँधेरे शब्द पा जायेंगे ज़िन्दगी.
Saturday, February 21, 2009
दरवाज़ा
जब तुम खोलोगी दरवाज़ा,
तो तुम्हारे पीछे का वो आला
अपनी कितोबों की आभा
उड़ेल देगा तुम पर,
खिड़की की धूप
रौशन कर देगी तुमको
और हवा
न जाने तुम्हारी कितनी ही खुशबूएं ले आएँगी मुझ तक
चिड़ियों की न जाने कितनी ही आवाजें
तुम्हारे साथ मुझे अंगीकार करने को आतुर होंगी,
और पलाश की अन्तिम किरण
हमारे ही कमरे में बुझेगी.
तुम्हारी हँसी जैसे दिन के हर यौवन को
अपनी अंजलि से उछाल देगी मेरी तरफ़.
और जब तुम्हारे होठों की परछाइयां झुकेंगी मेरे होठों पर
सांझ का रंग डूब जाएगा.
तब आनंत में एक खिड़की खुलेगी
और हमारी देह को दीप्त करती हुई
अन्तरिक्ष में प्रेम की जगह बनाएगी.
अनंत तारों एक बिछौना होगा
और हमारी देह
एक ज्वलंत पुष्प!
तो तुम्हारे पीछे का वो आला
अपनी कितोबों की आभा
उड़ेल देगा तुम पर,
खिड़की की धूप
रौशन कर देगी तुमको
और हवा
न जाने तुम्हारी कितनी ही खुशबूएं ले आएँगी मुझ तक
चिड़ियों की न जाने कितनी ही आवाजें
तुम्हारे साथ मुझे अंगीकार करने को आतुर होंगी,
और पलाश की अन्तिम किरण
हमारे ही कमरे में बुझेगी.
तुम्हारी हँसी जैसे दिन के हर यौवन को
अपनी अंजलि से उछाल देगी मेरी तरफ़.
और जब तुम्हारे होठों की परछाइयां झुकेंगी मेरे होठों पर
सांझ का रंग डूब जाएगा.
तब आनंत में एक खिड़की खुलेगी
और हमारी देह को दीप्त करती हुई
अन्तरिक्ष में प्रेम की जगह बनाएगी.
अनंत तारों एक बिछौना होगा
और हमारी देह
एक ज्वलंत पुष्प!
Sunday, January 18, 2009
हारे हुए शब्दों का मोल
सुनो, तुम मेरे शब्दों का मोल क्या दोगे?
कहाँ हैं तुम्हारी जेब में आकाश गंगा और हजारों सितारे?
बिस्तर की कितनी ही सिलवटों में
धरती,आकाश
और अन्जले चिरागों को समेटा है मैंने.
तुम्हारे अस्वीकार के बाद
उन हारे हुए शब्दों का क्या मोल?
डूबते हुए अंधेरे के अदृश्य कम्पन में
चाँद मेरी आंखों में कई बार डूबा है,
तुम्हारे बदलते रंगों से ,
तुम्हारी त्वचा के उजास से
अंधेरे और उजाले के बीच की खामोशी से.
अपने अंगों से,
अपनी देह से,
अपने मन से,
अपने ही भार से,
और तुम्हारे मर्दन से,
डर लगता है
तुम्हारा चुप रहकर मेरे निराश झरोखे पर खड़े रहना
अंत के पहले का विषाद नही तो और क्या है?
तुम्हारे होने का न तो हवा को पता है न ही धूप को
तुम्हारी झुलसती अंतरात्मा और पथराती देह क्या मोल देगी मेरे शब्दों का,
क्यूंकि धूप नही कहती की उसके पास रौशनी है
और आग की उसके पास लपटें.
कहाँ हैं तुम्हारी जेब में आकाश गंगा और हजारों सितारे?
बिस्तर की कितनी ही सिलवटों में
धरती,आकाश
और अन्जले चिरागों को समेटा है मैंने.
तुम्हारे अस्वीकार के बाद
उन हारे हुए शब्दों का क्या मोल?
डूबते हुए अंधेरे के अदृश्य कम्पन में
चाँद मेरी आंखों में कई बार डूबा है,
तुम्हारे बदलते रंगों से ,
तुम्हारी त्वचा के उजास से
अंधेरे और उजाले के बीच की खामोशी से.
अपने अंगों से,
अपनी देह से,
अपने मन से,
अपने ही भार से,
और तुम्हारे मर्दन से,
डर लगता है
तुम्हारा चुप रहकर मेरे निराश झरोखे पर खड़े रहना
अंत के पहले का विषाद नही तो और क्या है?
तुम्हारे होने का न तो हवा को पता है न ही धूप को
तुम्हारी झुलसती अंतरात्मा और पथराती देह क्या मोल देगी मेरे शब्दों का,
क्यूंकि धूप नही कहती की उसके पास रौशनी है
और आग की उसके पास लपटें.
Friday, December 12, 2008
यूँ ही
मैंने सोचा
कि उसके चले जाने से,
जो कांपती सी खाली जगह बची है,
वहाँ कुछ शब्द रख दूँ,
फिर मन में आया,
कि खुरदरे संबंधों और अपमानित आशाओं को क्या नाम दूँगा?
क्यूंकि जाले सिर्फ़ कमरों में ही नहीं,
मन और शरीर पर भी तो उग आए हैं!
मेरे शब्दकोष पर लगे ताले कि चाबी
तो बरसों पहले ही खो दी थी उसने,
पता नही यह जगह
उसे अब याद भी होगी या नही.
इस ताले में रखे शब्द
मुझे उससे जोड़ेंगे या स्पंदित होकर ख़ुद भी खो जायेंगे.
मुझे मालूम है कि
बिना शब्दों के
न तो वो बचेगी न ही ये स्पंदन,
जो बचेगा वो मैं ही होऊंगा ,
क्यूंकि उजाले और मटियाले कि महक बताने के लिए
किसी को तो बचना होगा
शब्दों कि जगह.
कि उसके चले जाने से,
जो कांपती सी खाली जगह बची है,
वहाँ कुछ शब्द रख दूँ,
फिर मन में आया,
कि खुरदरे संबंधों और अपमानित आशाओं को क्या नाम दूँगा?
क्यूंकि जाले सिर्फ़ कमरों में ही नहीं,
मन और शरीर पर भी तो उग आए हैं!
मेरे शब्दकोष पर लगे ताले कि चाबी
तो बरसों पहले ही खो दी थी उसने,
पता नही यह जगह
उसे अब याद भी होगी या नही.
इस ताले में रखे शब्द
मुझे उससे जोड़ेंगे या स्पंदित होकर ख़ुद भी खो जायेंगे.
मुझे मालूम है कि
बिना शब्दों के
न तो वो बचेगी न ही ये स्पंदन,
जो बचेगा वो मैं ही होऊंगा ,
क्यूंकि उजाले और मटियाले कि महक बताने के लिए
किसी को तो बचना होगा
शब्दों कि जगह.
Wednesday, November 26, 2008
ऐ ज़िन्दगी
ऐ ज़िन्दगी आ,
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.
हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.
ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.
सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.
उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.
तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.
मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.
ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.
इक शाम मेरे घर भी आ.
करेंगे बैठकर दो चार बातें,
मेरी पोटली में बहुत कुछ है जो है दिखाना तुझको,
मेरे पास बहुत कुछ है जो है सुनाना तुझको.
हैरान ना होना,जो इक बात पूछूँ तुमसे,
सुना है!
बहुत खूबसूरत हो तुम?
गर ये सच है
तो परदे में आना ऐ ज़िन्दगी,
अब तो हर खूबसूरत चीज़ डराती है मुझको.
ये जो चाँद है न! सोचता हूँ तोड़ लूँ इसको,
ये जो तारे हैं, सोचता हूँ नोच लूँ इनको,
और सजा लूँ अपने घर के आँगन में.
सोचता हूँ अब तो घर में खुशियाँ ही रखूँ,
ये जो मैले से गम हैं इन्हे अलविदा कर दूँ.
उकता गया हूँ इस तरह जीने से मैं,
थक गया हूँ ख़ुद को ख़ुद ही से मिलाने में मैं.
तुम आओ तो मेरा पता देना,
हो सके तो कुछ और भी बता देना.
मैं आँगन में खड़ा हूँ,
तक रहा हूँ रास्ता तेरा.
ऐ ज़िन्दगी आ इक शाम मेरे घर भी,
करेंगे बैठकर दो चार बातें.
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Thursday, October 23, 2008
ग़ज़ल
इकरारे-गुनाह इश्क है शरहे-हयात अब,
नज़रों से रह गई जो, क्या हो वो बात अब.
जो जिस्म नाजनीं था निगारे नज़रनवाज़,
वो है निगाह में बर्के-सिफात अब.
गम से जो छूटा हूँ तो ये गम है मुझे,
शबे-अलम से क्यूँकर है नजात अब.
किसने हकीकतों के खज़ाने लुटा दिए,
बेमाया इस कदर है मेरी सौगात अब.
माना तेरे करम में कोई कमी नही,
पर पहले सी है कहाँ मेरी औकात अब.
नींद आ चली है बशर, तबीयत हरी नहीं,
दुनिया है बेठिकाना, क्या आबे-हयात अब.
बशर - my pen name
शरहे-हयात - जीवन का निचोड़
शबे-अलम - दुःख की रात
निगारे नज़रनवाज़- नज़र को मासूम लगने वाला
बर्के-सिफात - बिजलियाँ गिराने वाला
बेमया - तुच्छ
नज़रों से रह गई जो, क्या हो वो बात अब.
जो जिस्म नाजनीं था निगारे नज़रनवाज़,
वो है निगाह में बर्के-सिफात अब.
गम से जो छूटा हूँ तो ये गम है मुझे,
शबे-अलम से क्यूँकर है नजात अब.
किसने हकीकतों के खज़ाने लुटा दिए,
बेमाया इस कदर है मेरी सौगात अब.
माना तेरे करम में कोई कमी नही,
पर पहले सी है कहाँ मेरी औकात अब.
नींद आ चली है बशर, तबीयत हरी नहीं,
दुनिया है बेठिकाना, क्या आबे-हयात अब.
बशर - my pen name
शरहे-हयात - जीवन का निचोड़
शबे-अलम - दुःख की रात
निगारे नज़रनवाज़- नज़र को मासूम लगने वाला
बर्के-सिफात - बिजलियाँ गिराने वाला
बेमया - तुच्छ
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