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Monday, September 29, 2008

आओ आलिंगन करें

आओ आलिंगन करें
जैसे फूल करता है फूल को
सूरज आभा को और रात चाँदनी को !

आओ आलिंगन करें
जैसे बारिश करती है
धरा को, पहाड़ को पेड़ को, पौधे को
और सम्पूर्ण अंतर्मन को !

आओ आलिंगन करें

क्यूंकि प्रेम से ही सब विद्यमान है
मैं और तुम भी!
दिन और वर्ष सब छूट जायेंगे,
और आँगन में पड़ी साँझ को कहीं लिखा नही जाएगा,
चिडियों की अनगिनत आवाजें बेमानी होंगी
और तुम्हरी देह से टकराती धूप
और आद्र अधर कहीं खो जायेंगे!

आओ आलिंगन करें
क्यूंकि यह रितुगान है,
बुदबुदाते हुए होठों की कामना है,
यह नई कोपलों का स्पष्ट आकार है,
ये वसंत की शुरुआत है
ये झिझकते स्पर्श से
तपते हुए संसार का आभास है
ये पतझड़ से नग्न हुए पेडों पर
नए जीवन का संचार है.